गणेश चतुर्थी की कथा Ganesh Chaturthi Ki Katha

Ganesh Chaturthi Ki Katha lyrics

गणेश चतुर्थी की कथा Ganesh Chaturthi Ki Katha



परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिक स्वयं को विजेता बताने लगे। तब शिव जी ने श्री गणेश जी से पृथ्वी की परिक्रमा न करने का कारण पूछा। तब गणेश जी कहा माता- पिता के चरणों में ही समस्त लोक है । यह सुनकर भगवान शिव ने गणेश जी को देवताओं का संकट दूर करने की आज्ञा दी।

इस प्रकार भगवान शिव ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया। की चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्ग देगा। उसकी तीनों ताप यानि देहिक ताप, देविकताप, तथा भैतिकताप दूर होगी। इस व्रत को करने से व्रत धारी के सभी तरह के दुःख दूर होंगे और उसे जीवन के भैतिक सुखों की प्राप्ति होगी। चारों तरफ से मनुष्य की सुख समृधि बढ़ेगी। पुत्र पौत्र आदि धन ऐश्वर्य की कमी नहीं रहेगी।

संकष्टि गणेश चतुर्थी व्रत की दूसरी कथा

एक समय की बात है राजा हरिश्चंद्र के राज्य में एक कुम्हार रहते थे। वह मिट्टी के बर्तन बनाता लेकिन वह कच्चे रह जाते थे। एक पुजारी के सलाह पर उसने इस समस्या को दूर करने के लिए एक छोटे बालक को मिट्टी के बर्तनों के साथ आवां में डाल दिया। उस दिन संकष्टि चतुर्थी का दिन था। उस बच्चे की माँ अपने बेटे के लिए परेशान थी।

उसने गणेश जी से अपने बेटे की कुशलता के लिए प्रार्थना की दूसरे दिन जब कुम्हार ने उठकर देखा तो आवां में उसके बर्तन तो पक गए थे। लेकिन बच्चे का बाल भी बांका नहीं हुआ। वह डर गया और राजा के दरबार में जाकर सारी घटना बताई। इसके बाद राजा ने बच्चे और उसकी माँ को बुलाया। तो माँ ने सभी तरह के विघ्न को दूर करने वाली संकष्टि चतुर्थी का वर्णन किया। इस घटना के बाद से महिलाएं संतान तथा परिवार के सौभाग्य के लिए संकष्टि गणेश चतुर्थी का व्रत करने लगी।

संकष्टि गणेश चतुर्थी की तीसरी कथा

एक समय की बात है। भगवान विष्णु का विवाह लक्ष्मी जी के साथ निश्चित हो गया। विवाह की तैयारी होने लगी। सभी देवताओं को निमंत्रण भेजे गए। परन्तु गणेश जी को निमंत्रण नहीं दिया। कारण जो भी रहा हो अब भगवान विष्णु की बारात जाने का समय आ गया। सभी देवता अपनी पत्नियों के साथ विवाह समारोह में आये। उन सबने देखा कि गणेश जी कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। तब वे आपस में चर्चा करने लगे की क्या गणेश जी को नैवता नहीं है या स्वयं गणेश जी नहीं नहीं आये।

सभी को इस बात पर आश्चर्य होने लगा। तभी सबने विचार किया कि भगवान विष्णु से ही इसका कारण पूछा जाए। विष्णु भगवान से पूछने पर उन्होंने कहा कि हमने गणेश जी के पिता भोले नाथ को नैवता भेजा है। यदि गणेश जी अपने पिता के साथ आना चाहते हो आ सकते। अलग से न्यौता देने की कोई आवश्यकता भी नहीं थी।

दूसरी बात यह है कि उनको सवा मन मूंग, सवा मन चावल, सवा मन घी और सवा मन लड्डू का भोजन दिन भर में चाहिए। यदि गणेश जी नहीं आयेगे तो कोई बात नहीं। दूसरे के घर जाकर इतना सारा खाना पीना अच्छा भी नहीं लगता । इतनी वर्ता कर ही रहे थे।

कि किसी एक ने सुझाव किया कि यदि गणेश जी आ भी जाए तो द्वारपल बनाकर बैठा देगे। कि आप घर का याद रखना कि आप चूहे पर बैठकर धीरे धीरे चलोगे तो बारात से बहुत पीछे रह जाओगे । यह सुझव्सबको अच्छा लगा तो भगवान विष्णु ने भी सहमति दे दी।

होना क्या था इतने मै गणेश जी वहाँ आ पहुँचे और उन्हें समझा बुझ कर घर की रखवाली करने के लिए बैठा दिया। बारात चल दिए तब नारद जी ने देखा कि गणेश जी दरवाजे पर बैठा है। नारद जी ने गणेश जी से पूछा कि वह बारात क्यो नही गये। तब गणेश जी ने कहा कि भगवान विष्णु ने उन्हें अपने निवस् स्थान सौप कर गए है अब मै यहाँ का राजा हूँ।

तब नारद जी हस्ते हुए कहने लगे कि ये भी तो हो सकता हैं कि उन्होंने आपको द्वारपल के रूप मे यहाँ बैठाया है। तब गणेश जी कहने लगे कि हाँ विष्णु भगवान ने मेरा बहुत अपमान किया है । नारद जी ने कहा कि आप उदास न हो आप अपने मुसक सेना को आगे भेज दे तो वह रास्ता खोद देगी। जिससे उनकी वाहन धरती में धस जाएगे।

तब आपको सम्मान पूर्वक बुलाना पड़ेगा । अब तो गणेश जी अपनी मुसक सेना को जल्दी से आगे भेज दी है और सेना ने जमीन पोली कर दी। जब बारात वहाँ से नकली तो रथो की पहियाधरती मे धस गई। लाख कोशिश करे परंतु पहिये नही निकले। सभी ने अपने-अपने उपाय किए। परंतु पहिये तो नहीं निकले बल्कि जगह – जगह से टूट गये।

किसी को समझ नही आ रहा था अब क्या किया जाए तब नारद जी ने कहा आप लोगो ने गणेश जी का अपमान कर अच्छा नहीं किया यदि उन्हें मना कर लाये तो आपका कार्य ठीक हो सकता है। और ये संकट टल सकता है। शंकर भगवान ने अपने दूत नन्दी को भेजा और वे गणेश जी को लेकर आये। गणेश जी का आदर सम्मान के साथ पूजन किया।

तब रथ के पहिये निकले अब रथ के पहिये तो निकल गए लेकिन रथ के पहिये तो टूटे फूटे थे। तो उन्हें सुधारे कौन, बांस के खेत में खादी काम कर रहा था। उसे बुलाया गया खादी अपने कार्य करने से पहले श्री गणेशाय: नमः कह कर गणेश जी की वंदना मन ही मन करने लगा।

देखते ही देखते खादी ने सभी पहिये को ठीक कर दिया तब खादी कहने लगा हे देवताओं अपने सर्वपर्थम् गणेश जी को नहीं मनाया होगा और न ही इनकी पूजन की होगी इसी लिए तो आपके साथ यह संकट आया है। हम तो मुर्ख अज्ञानी है फिर भी पहले गणेश जी को पूजते है उनका ध्यान करते है। आप लोग तो देवता गण है।

फिर भी आप गणेश जी को कैसे भूल गये। आप लोग भगवान श्री गणेश की जय बोल कर जाये तो आप के सब कार्य बन जायेंगे और कोई संकट भी नहीं आयेगा।ऐसा कहते हुए बारात वहाँ से चल दिए और भगवान विष्णु का विवाह लक्ष्मी जी के साथ सम्पन्न करा के सभी सखुशल घर लौट आए। ऐ श्री गणेश जी महाराज आप विष्णु भगवान जी के जैसे कार्य सिद्ध किए है। उसी प्रकार सभी के कार्य सिद्ध करे।

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